नई दिल्ली। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी नितिन नबीन ने ऐसे समय संभाली है, जब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, पुदुचेरी और केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव की सियासी सरगर्मी तेज है। इनमें से किसी भी राज्य में बीजेपी के लिए चुनावी लड़ाई आसान नहीं है। नितिन नबीन ने अपनी ताजपोशी के साथ पांच राज्यों में होने वाले चुनाव के लिए ताबड़तोड़ फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। नितिन नबीन ने बीजेपी के लिए सबसे मुश्किल माने जाने वाले केरल विधानसभा चुनाव की कमान विनोद तावड़े को सौंपी तो साथ ही चंडीगढ़ मेयर चुनाव के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। उनके साथ शोभा करंदलाजे को सह प्रभारी बनाया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि विनोद तावड़े बिहार की तरह ही केरल में भी कमल खिला पाएंगे? वहीं, आशीष शेलार को तेलंगाना नगर निकाय चुनाव का प्रभारी नियुक्त किया है। उनके साथ अशोक परनामी व रेखा शर्मा को सह प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा वरिष्ठ नेता राम माधव को ग्रेटर बेंगलुरु निकाय चुनाव का प्रभारी नियुक्त किया गया है तो सतीश पुनिया और संजय उपाध्याय को सह प्रभारी का दातित्व सौंपा है।
विनोद तावड़े को मिला केरल का मुश्किल टास्क
मिशन साउथ के तहत बीजेपी दक्षिण भारत के तमाम राज्यों में अपनी सियासी जमीन तलाश रही है। फिर चाहे तमिलनाडु हो या फिर केरल विधानसभा चुनाव का मैदान। पीएम मोदी समेत तमाम बड़े नेताओं की नजर इन राज्यों पर टिकी है। ऐसे में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने केरल की चुनावी जंग को फतह करने के लिए बिहार चुनाव जिताने वाले विनोद तावड़े को सौंपी है, उन्हें विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाया है और साथ ही कर्नाटक से आने वाली
शोभा करंदलाजे को सौंपा है।
केरल में सत्ता का रास्ते को ईसाई और मुस्लिम वोट के द्वारा तय होते है, जिसके चलते ही बीजेपी की राह काफी मुश्किल भरी रही है। बीजेपी केरल में तेजी से बढ़ी है, लेकिन सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने में यूडीएफ और एलडीएफ एक बड़ी बाधा हैं। केरल का चुनाव इन्हीं दोनों गठबंधन के बीच सिमटा हुआ है। हालांकि, बीजेपी को केरल में 2014 में14 प्रतिशत वोट मिले थे, 2019 में 16 प्रतिशत और 2024 में यह बढ़कर 20 प्रतिशत हो गया। बीजेपी को केरल की सत्ता तक पहुंचने के लिए 20 से 30 और 30 से 40 फीसदी के वोट क का सफर तय करना है। ऐसे में विनोद तावड़े को एक मुश्किल भरा टास्क नितिन नबीन ने सौंपा है।
बिहार की तरह केरल में खिला पाएंगे कमल
विनोद तावड़े को भले ही केरल चुनाव में बीजेपी को जिताने की जिम्मेदारी मिली हो, लेकिन बिहार की तरह केरल की राह आसान नहीं है। केरल में बीजेपी के लिए इसलिए भी मुश्किल रहा है, क्योंकि यहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और लेफ्ट-सीपीएम के अगुवाई वाले एलडीएफ का अपना-अपना मजबूत वोट बैंक है। केरल में मुस्लिम और ईसाई वोटर ही नहीं हिंदू वोटर भी यूडीएफ और एलडीएफ के बीच बंटे हुए हैं, बीजेपी तेजी से अपने पैर पसारे हैं, पर सत्ता तक पहुंचने की मंजिल काफी मुश्किल भरी है।
केरल की कुल आबादी में नायर समुदाय करीब 15 फीसदी हिस्सेदारी रखता है। इसमें केरल के अपर कास्ट हिंदू आते हैं। इसके अलावा पिछड़ा वर्ग के तहत आने वाले एझवा समुदाय भी काफी अहम भूमिका निभाता है। इसकी केरल में कुल आबादी करीब 28 फीसदी है। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन खुद इस समुदाय से आते हैं। यानी विजयन का ये पारंपरिक वोट बैंक है। इसीलिए इस पर सीपीएम का एकाधिकार माना जाता है।
केरल की राजनीति को जानने वाले बीजेपी की हार का कारण केरल की साक्षरता दर को भी मानते हैं। उनका कहना है कि केरल में देश के बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा पढ़े-लिखे लोग हैं, जो किसी भी मुद्दे पर भावनाओं में बहकर वोट नहीं करते हैं। लोगों को हर विषय की अच्छी जानकारी होती है और वो स्पष्ट होते हैं कि उन्हें कहां और किसे वोट करना है।
मुस्लिम और ईसाई में सेंधमारी कितनी मुश्किल
केरल में मुस्लिम और ईसाई समुदाय की आबादी 45 फीसदी है। जिसमें बीजेपी अभी तक सेंध नहीं लगा पाई। इस 45 फीसदी वोटबैंक में बिना सेंधमारी किए केरल की सत्ता में आना मुमकिन नहीं है। हालांकि, पिछले चुनावों में बीजेपी का केरल के नायर समुदाय में वोट बैंक बढ़ा है। सबरीमाला के मुद्दे के बाद से ही ये समुदाय बीजेपी की तरफ झुकता नजर आया।
केरल के 45 फीसदी वोट बैंक की हमने बात की, यानी अल्पसंख्यक वोट बैंक कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ का माना जाता है। ईसाई और मुस्लिम ज्यादातर इसी फ्रंट को चुनते हैं। वहीं केरल की पिछड़ी जातियों में लेफ्ट का काफी ज्यादा प्रभाव माना जाता है। केरल में हिंदू वोट करीब 55 फीसदी है, जिनके वोट एलडीएफ और यूडीएफ के बीच बंटे हुए हैं।
बीजेपी क्या हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर पाएगी
केरल में हिंदू वोटों का कितना भी ध्रुवीकरण हो जाए ये बीजेपी को जीत तक नहीं पहुंचा सकते हैं। हिंदू वोटों के बड़े हिस्से पर लेफ्ट और कांग्रेस का कब्जा है। केरल में पिछले करीब 80 साल से आरएसएस लगातार काम कर रहा है। देश के अलग-अलग राज्यों में भी आरएसएस कार्यकर्ता और नेता बीजेपी के लिए जमीन बनाने का काम करते आए हैं और कई जगह पार्टी को सफलता भी हाथ लगी है। लेकिन केरल में अब तक कोई करिश्मा नहीं दिखा है।
राज्य के तकरीबन 80 फीसदी हिंदू दो प्रमुख संगठनों- एसएनडीपी और एएसएस के समर्थक हैं। इनमें एसएनडीपी को ओबीसी मानी जाने वाली जाति के और दूसरा एनएसएस अगड़ी जातियों में आने वाले नायर लोगों का संगठन है। बीजेपी तमाम कोशिशों के बाद भी इन दोनों संगठनों में अपनी पैठ नहीं जमा सकी है। एनएनडीपी के समर्थन वाले राजनीतिक संगठन बीडीजेएस से गठजोड़ कर नायर वोटों के बीच तोड़ी पकड़ बनाई है।
बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग कैसे होगी हिट
केरल में बीजेपी हर समुदाय में ध्रुवीकरण की तरफ देख रही है। हिंदू वोटों में ध्रुवीकरण करने में पार्टी कहीं न कहीं कामयाब भी रही है। बीजेपी कहीं न कहीं खुद को तीसरे मोर्चे के तौर पर स्थापित करने में कामयाब रही है। हालांकि ये उतनी संख्या में नहीं है, जिनती पार्टी को जरूरत थी।
बीजेपी के सामने दो विकल्प हैं, पहला तो वो हिंदू वोटर (55 फीसदी) का पूरी तरह ध्रुवीकरण कर अपना जनाधार बनाए, वहीं दूसरा विकल्प ये है कि वो अल्पसंख्यक वोट बैंक (45%) में सेंधमारी कर अपने लिए जमीन बनाने का काम करे। मुस्लिम वोटों से बीजेपी को ज्यादा उम्मीद नहीं है, लेकिन ईसाई वोटर्स को अपने पाले में खींचने की पूरी कोशिश हो रही है।
हालांकि, बीजेपी के सामने चेहरे की कमी है। ऐसे कोई चेहरा नहीं है, जिसे पेश करके केरल की जंग फतह कर ले। कुछ एक को छोड़ दिया जाए तो बहुतों का जनता से सीधा कनेक्शन नहीं हैं। इसके अलावा बीजेपी का संगठन भी जमीनी स्तर पर उस तरह से नहीं है, जैसे उत्तर भारत के राज्य में है। ऐसे में अब देखना होगा कि विनोद तावड़े क्या केरल की जमीन पर बीजेपी का कमल खिलाने की चुनौती को पूर कर पाएंगे?
